गुरु_गोरक्षनाथ_अक्षय_जयंती_प्रगट_महोत्सव 7 मई गुरुवार को लोक डाउन सरकारी गाइडलाइन के अनुसार मनाया गया ।
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गोरक्षनाथ-अक्षय जयंती की हार्दिक शुभकामनायें...
भगवान शिव के साक्षात् योगावतार परम गुरु भगवान गोरक्षनाथ के प्रकटोत्सव - अक्षय जयंती के पावन अवसर पर आप सभी नाथ संप्रदाय और नाथ योगी समाज के गृहस्थ - विरक्त अनुयायियों व समस्त शिष्य - सेवक - भक्त गणों को हार्दिक शुभकामनायें और ढेर सारी बधाई...
नाथ परम्पराओ और पद्मपुराण, स्कन्द , शिव, ब्रह्मण्ड आदि पुराणों , तंत्र महार्णव आदि तांत्रिक ग्रंथ बृहदारण्यक आदि उपनिषदों में तथा प्राचीन ग्रंथ रत्नों के अनुसार श्री गुरु गोरक्षनाथ अयोनिज , चारो युगों में विद्यमान , अमरकाय एवं अपनी सिद्ध देह से वर्तमान है ! श्री गोरक्षनाथ जी सतयुग में पेशावर (पंजाब) में, त्रेतायुग में गोरखपुर- उत्तरप्रदेश, द्वापर युग में हरमुज- द्वारिका के पास तथा कलियुग में गोरखमढी- सौराष्ट्र में आविर्भूत हुए थे।
गर्गसंहिता के अनुसार देवताओं द्वारा महादेव शिवशंकर से प्रश्न करने पर महादेव शिव ने कहा कि :-
अहमेवास्मि गोरक्षो , मदरूपं तन्निबोधत।
योग मार्ग प्रचाराय मया रूपमिदं धृतम।।
अर्थात :- मैं ही गोरक्षनाथ हूं, मेरा ही रूप गोरक्षनाथ को जानो, लोककल्याणकारी योग मार्ग का प्रचार करने के लिये मैंने ही गोरक्षनाथ का अवतार लिया है।
जिस दिन शिव का गोरक्षनाथ रूप में प्राकटय हुआ , उसको - गोरक्षनाथावतार कथा - ग्रन्थ के श्लोक में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है :-
वैशाखी-शिव-पूर्णिमा-तिथिवरे वारे शिवे मंगले ।
लोकानुग्रह-विग्रह: शिवगुरुर्गोरक्षनाथो भवत ।।
योगी प्रवर नरहरिनाथजी (राजगुरु नेपाल ) के अनुसार महायोगी गोरक्षनाथ जी का प्रकटीकरण वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि मंगलवार को हुआ था। यह वैशाख पूर्णिमा किस युग, कल्प, काल, वर्ष की है , यह अज्ञात होने से भगवान गोरक्षनाथ जी का प्रकटोत्सव यह (अक्षय - जयंती) मनाई जाती है...चारों युगों में विद्यमान एक अयोनिज अमर महायोगी सिद्ध महापुरुष के रूप में एशिया के विशाल भूखंड तिब्बत, मंगोलिया, कंधार, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, सिंघल तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपने योग से कृतार्थकर गुरु शिष्य परम्परा से अंखड भारतवर्ष को अमूल्य निधि वरदानस्वरुप दी है... महागुरु गोरक्षनाथ ने नाथ पंथ के योग - दर्शन में भारतीय धर्म साधना का एक ऐसा मिला जुला साधनामार्ग प्रस्तुत किया जिसमे एक तरफ वेदान्त का स्वर हे तो दूसरी ओर योग का आत्म चिन्तन के साथ ही सांख्य का प्रक्रति और पुरूषवाद...सम्पूर्ण भारतीय चिन्तन धाराओं में गुरु गोरक्ष नाथ ने ऐसी अटक लगाई कि सभी चिन्तन योग मे विश्राम करने लगे |
औघङ देव कुबेर भण्डारी सहजाई सिद्धनाथ केदारी
अनंत कोटि योगेश्वर राजा तजे राज योग के काजा
महागुरु गोरक्षनाथजी की शिक्षा एंव चमत्कारों से प्रभावित होकर अनेकों बड़े-बड़े राजा - महाराजा इनसे दीक्षित हुए। उन्होंने अपने अतुल वैभव को त्याग कर निजानन्द प्राप्त किया तथा जन-कल्याण में अग्रसर हुए। इन राजर्षियों द्वारा बड़े-बड़े कार्य हुए। आज भी किन्ही सौभाग्यशाली योगियों - भक्तो को योगेश्वर गोरक्षनाथजी महाराज के दर्शन होते है ! गोरक्षनाथजी अपने दिव्य विग्रह से कही भी प्रकट होकर कुछ काल तक अपनी लीलाये कर पुन: अन्तर्धान हो जाते थे ! गुरु गोरक्षनाथजी के चारो दिशाओ में सुदूर विदेशो तक अनेकानेक देवालय , मठ - मंदिर, धुनी - गुफाए , चरण पादुकाये, तप:स्थली आदि सर्वत्र मिलते है लेकिन उनका समाधी - मंदिर कही पर भी नहीं है । इनके प्रादुर्भाव और अवसान का कोई लेख अब तक प्राप्त नही हुआ। इस कारण नाथ संप्रदाय - नाथ योगी समाज के धर्म ग्रंथो में कही भी गोरक्षनाथ - जयंती मनाने का प्रमाण नहीं मिलता।
भगवान कृष्ण जी ने गुरु गौरक्षनाथजी की स्तुती की है
सिद्धानां च महासिद्ध ऋषीणां च ऋषिश्वरः ।
योगिनां चैव योगिन्द्रः श्री गोरक्ष नमोस्तुते - श्रीकृष्ण
विश्व मे लगभग 35 देशो मे आज भी गुरु गौरक्षनाथ जी पर शोध हो रहे है
महामती जोर्ज वैस्टन ब्रिग्स जर्मनी ने गुरु गौरक्षनाथ एण्ड कनफटा योगीज् पुस्तक 1924 मे लिखी
इटली के कवि एव. पी टैसिटरी ने गुरु गौरक्षनाथजी पर बहुत लिखा है
जी ए ग्रियसन ने भी नाथजी के बारे मे काफी लिखा है
उसमान जी ने चित्रावली के परेवाखण्ड मे गुरु गौरक्षनाथजी की महिमा का वर्णन किया है
डा कल्याणी मलिक ने अपने ग्रंथ नाथ सम्प्रदाय ईतिहास और साधना प्रणाली ( पूणे से प्रकाशित)
संत हरिदास जी महाराज निरंञ्जनी गुरु गौरक्षनाथ की साधना और व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित और गुरुजी के लिऐ उन्होने भी अपने उपदेश गन्थो मे लिखा है
जसनाथ जी बीकानेर मे कलरियासर सम्वत 1539 ई.मे
गुरु परसादे गौरक्ष बचने सिद्ध जसनाथ उचारे प्रसिद्ध है
भीष्मभट्ट जी ने गुरु गौरक्षनाथजी पर प्रसिद्ध ग्रंथ विवेक मार्तण्ड का बडी मौलिक रचना संस्कृत भाषा मे प्रस्तुत की है
द साईक्लोपीडिया आफ इण्डिया एण्ड ईस्टर्न सदर्न ऐशिया के पृष्ठ 1335 पर बालफर एडवर्ट का जिसका उल्लेख जोर्ज वैस्न ब्रिंग्स की पुस्तक गौरक्षनाथ एण्ड कनफटा योगीज के पृष्ठ 211 पर भी किया है।
फैज्जुलारचित गौरक्षविजय बंगला काव्य मे भी रचित है।
महासूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी अपनी प्रसिद्ध काव्यकृति पद्मावत मे गुरु गौरक्षनाथजी को ही महायोगी सिद्ध स्वीकारते है।
नारद पुराण के उत्तर भाग 68 वे अध्याय मे गुरु गौरक्षनाथजी की महिमा का वर्णन है।
पृथ्वीधराचार्य ने अपनी रचना भवनेश्वरी स्त्रोत 37 मे गुरु गौरक्षनाथजी महाराज को सिद्धनाथ कहा है।
राजा मानसिंह जोधपुर ने तो इतना लिखा है कि कई पुस्तकालय बन गये पर नाथतीर्थावली बहुत प्रसिद्ध हुई ।
संत ज्ञानेश्वर ने गीता भव्य ज्ञानेश्वरी के 18 वे अध्याय मे स्वीकार किया है कि क्षीरसागर मे सप्तश्रृंग पर शिवोपान्तर
सिसोधिया राजवंश के संस्थापक महाराणा प्रताप के वशंज बप्पा रावल जी के बारे मे कोन नही जानता कि गुरु गौरक्षनाथजी ने ही उन्हे खङग दी थी जिससे वे विजयो पर विजयी रहे।
गोस्वामी तुलसीदासदास जी रामायण के कवितावली उत्तरकाण्ड 84 मे गौरक्षनाथजी के योग का वर्णन करते हुऐ कहा है-
गौरक्ष जगायो जोग भगति भगायो लोग
नियम नियोग ते सो कलि ही छरो-सा है ।।
अर्थात भगवान गुरु गौरक्षनाथजी ने योग क्या जगा दिया भक्ति ही लोगो के ह्रदय से निकल गई।
अत: महागुरु गौरक्षनाथजी का प्राकटय अयोनिज होने तथा उनकी हर युग में उपस्थिति और अमरता के कारण हमें भी उनकी जन्म- जयंती न मनाकर जय पर्व या विजय पर्व के रूप में अक्षय - जयंती मनानी चाहिए और गोरक्ष अक्षय जयंती के नाम - रूप से ही इसका व्यापक प्रचार प्रसार करना चाहिए। गुरु गोरक्षनाथजी ने समाज में फैली बुराइयों को दूर करके संपूर्ण मानवता को समानता का आध्यात्मिक संदेश दिया है, जिसका पालन करना हमारा परम एवं पुनीत कर्त्तव्य है !
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#संकलन_योगी :- #दिलकुश_नाथ_मोडियाला
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